हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फारसी क्या कहावत का क्या अर्थ है?

हिंदी भाषा में कई ऐसी कहावत और मुहावरे है जिन्हें पुराने समय में उनके हिसाब से बनाया गया है जिनका सही अर्थ उनके समय में सटीक बैठता था लेकिन वक्त के साथ साथ जमाना बदला गया है और उन मुहावरे और कहावतों के अर्थ को समझने में हमें थोड़ी मुश्किल होती है ।

यदि आप “हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या” का अर्थ देखने के लिए यहां आए हैं तो ये पोस्ट आपके लिए है आज इस पोस्ट में हम आपको hath kangan ko aarsi kya कहावत का arth अर्थ या hath kangan ko aarsi kya meaning समझाने वाले है तो पोस्ट पूरा पड़कर जाइएगा ।

 

Hath kangan ko aarsi kya pade likhe ko farshi kya arth

कहावत : “हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या”
अर्थ : “प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं”
“पढ़े लिखे लोगों के लिए कोई भाषा मुश्किल नहीं”

अब आप इस कहावत को गहराई से इस लेख में पड़ सकते है आप इस पोस्ट को hindibulk.in पर पड़ रहे हैं ।

“हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या” इस कहावत या लोकोक्ति में दो पद हैं मतलब दो अलग-अलग समय में बोली गयी कहावतों को जोड़कर एक साथ तुकबंदी की गयी है।

सबसे पहले आपको पहला पद “हाथ कंगन को आरसी क्या” के अर्थ को समझाने वाले है इस वाक्य में आरसी का मतलब आइना या दर्पण होता है।

इस कहावत के सम्बन्ध में दो अर्थ प्रचलित है।

 

1. यह कहावत उस जमाने या समय की है, जब दर्पण या आइने बहुत महंगे और बहुत कम लोगों के पास होते थे।
एक छोटे से दर्पण को आरसी कहा जाता था। उस जमाने में हाथ में पहनने वाले कंगन में आरसी से भी छोटे शीशे जड़े जाते थे, जो महंगे होते थे।

“हाथ कंगन को आरसी क्या”, कहावत का शाब्दिक अर्थ है – “जिसने हाथों में कांच से जड़े हुए कीमती कंगन पहने हुए हैं, तो उनके लिए आरसी को खरीदना कौन सा बड़ा मुश्किल काम है?”

Hath kangan ko aarsi kya मतलब जिन्होंने अपने हाथो में शीशे युक्त कंगन को पहना हुआ हो उन्हें अपनी शोहरत बताने के लिए आरसी की आवश्यकता नहीं है मतलब ये है की जिस वस्तु को आंखों के सामने देखा जा सके उसे किसी प्रमाण की भला का आवश्यकता ।

इसलिए कहावत बोली गई है की – “हाथ कंगन को आरसी क्या”।

2. दूसरा अर्थ यह है कि औरतों को अपने शृंगार के लिए दर्पण की आवश्यकता होती है जैसे अपने चेहरे के शृंगार के लिए दर्पण की आवश्यकता है ताकि उसमें सामने देखकर चेहरे का सही शृंगार किया जा सके लेकिन अगर हाथ में कंगन पहनना है तो उसे तो दर्पण में बिना देखे भी पहना जा सकता है, या ऐसा भी कहा जा सकता हैं कि हाथों में कंगन को पहनने के लिए शीशे की क्या जरूरत है? वो तो हम शीशे में बिना देखे भी पहन सकते हैं।

इसलिए इस कहावत का यही अर्थ होता है कि जो चीज प्रत्यक्ष यानी सामने देखी जा सकती है, उसके लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं पड़ती है।

इसकी उत्पत्ति उस जमाने में हुई जब संस्कृत भाषा बोली जाती थी यही कहावत संस्कृत में भी कही गयी है “हस्ते कंकणं किं दर्पणेन!” इसका मतलब भी वही है जो हिंदी में लिखी हुई कहावत का है।

हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या कहावत का अर्थ

अब दूसरी कहावत “पढ़े लिखे को फारसी क्या” के अर्थ के बारे में बात करते हैं इस वाक्य को पढ़ने से ही पता चलता है कि यह कहावत मुगलों के जमाने की है और इसमें फारसी का मतलब कठिन कार्य और कठिन भाषा से है ।

मुगलों के समय में फारसी भाषा अधिक प्रचलित थी, लेकिन अधिकांश हिन्दू इस भाषा को सीखना नहीं चाहते थे, क्योंकि उन्‍हें यह भाषा सीखने में कठिन लगती थी।

उसी समय कुछ हिंदुओं को लगा की आने वाले वक्त में फारसी भाषा का उपयोग बहुत किया जाएगा जिससे फारसी भाषा पड़े लिखों की जरूरत पड़ेगी इसलिए उन्होंने इस भाषा को सीखना प्रारंभ कर दिया ।

अब इन लोगों ने दुनिया में उपलब्ध सब भाषाओं का ज्ञान ग्रहण कर लिया जिससे आने वाले समय में ये लोग इस ज्ञान का फायदा ले सकें फारसी को सीखना थोड़ा कठिन समझा जाता था ।

इसलिए कहा जाता है की पढ़े लिखे को फारसी क्या मतलब जिन लोगों ने इतनी कठिन भाषा फारसी का ज्ञान हासिल कर लिया हो उन्हें अब दुनिया की कोई से भाषा सीखने में कठिन नहीं लगेगी ।

आप इस कहावत के अर्थ को क्रमशः पड़ सकते है –
“प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं”
“पढ़े लिखे लोगों के लिए कोई भाषा मुश्किल नहीं”
 

यही दोनों कहावतों का मतलब है मुझे आशा है की आपको ये लेख पसंद आया होगा

निष्कर्ष : आप को ये पोस्ट Hath kangan ko aarsi kya muhavare ka arth बताईए कैसी लगी नीचे टिप्पणी करके हमे जरूर बताएं और अपने सहपाठी को भी इस कहावत का अर्थ समझाने के लिए इस पोस्ट को उन्हें जरूर शेयर करें ।

 

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